तस्वीर उसकी है जिसको गंगा जमुनी तहज़ीब का नायक कहा गया!

आज दोपहर जब मैं बाब-ए-सैयद से गुज़र रहा था। अतिथि गृह के आस पास पुलिस बल तैनात था और बाब-ए-सैयद से साफ़ देखा जा सकता था कि कुछ दंगा नियंत्रण वाहन भी खड़े हैं। तब मैंने 15 -20 भगवा उत्पातियों को लाठी के साथ यूनिवर्सिटी सर्किल से बाब-ए-सैयद की तरफ़ बढ़ते हुए देखा, जिनके दोनों तरफ पुलिस ऐसे मार्च कर रही थी जैसे कोई परिवार अपनी बेटी को विदा कर रहा हो। नारे लग रहे थे, “भारत मैं रहना है तो वन्दे मातरम कहना है”, “वन्दे मातरम”, “जय श्री राम”, “जिन्नाह की तस्वीर हटाओ” और वह पुलिस के साथ आगे बढ़ रहे थे। यह क्यों मार्च निकाल रहे थे? इनके हाथों में हथियार क्यों हैं? इनकी क्या मंशा है? और पुलिस इनके साथ क्यों मार्च कर रही है? जैसे ही वह राम और भारत माता के लाडले बाब-ए-सैयद पर पहुंचे तभी एक प्रॉक्टर ऑफिस के एक सिपाही ने उनको रोका, “तेरी माँ की **** इधर आ” एक आवाज़ आयी, और फिर उनमें से एक देशभक्त ने अपने हाथों में बन्दूक ली और उस सिपाही पर तान दी। पुलिस देख रही थी। मीडिया के लोग बाब-ए-सैयद की क्यारियों की छांव में खड़े थे और अभी कैमरे बंद थे। बन्दूक देख कर पुलिस के लोग उस सिपाही को अपने साथ वहां से निकाल कर ले गए। अभी भी भारत माता के लाडले उसकी अस्मत बचाने के लिए आगे बढ़ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे बाब-ए-सैयद के उस पार जिन्नाह खड़े हैं और इस पार “वीर” सावरकर के बच्चे जिनको मानो क़ानून व्यवस्था से कोई लेना देना नहीं है । यह सोच लिए आगे बढ़ रहे थे मानो आज जिन्नाह को ख़त्म ही कर देंगे। पुलिस और मीडिया छाँव में खड़ी थी। फिर शायद चार या पांच लड़के जो वहां से गुज़र रहे थे अपनी गाड़ियों से उतरे और इन देशभक्त लालों को खदेड़ना शुरू किया, मैंने अपनी आँखों से पहली बार 5 लोगों को 20 देशभक्तों को दौड़ाते हुए देखा था। पुलिस चौकन्नी हुई और बीच बचाव के लिए आगे आयी। वह भारत माता के लाल क्षण भर में ग़ायब हो गये। मैं सोच रहा था कि पुलिस इनको गिरफ़्तार क्यों नहीं करती? फिर याद आया जिन्नाह की तस्वीर का मुद्दा तो अलीगढ के सांसद ने ही उठाया है, इनका कोई बाल भी बांका कैसे कर सकता है भला? बाद मैं पता चला के उनको गिरफ्तार कर लिया गया है और वह सिविल लाइन्स थाने में हैं। अब बाब-ए-सैयद पर भीड़ लगना शुरू हो गयी थी। यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट्स यूनियन भी आ चुकी थी और बाकी छात्र भी आ चुके थे। प्रॉक्टर साहब और पुलिस के बड़े आला अफ़सर भी पहुंच रहे थे। मानो के अभी तक स्थानीय ख़ुफ़िया अधिकारी (LIO) सो रहे होंगे? सो रहे होंगे? नहीं नहीं पुलिस तो साथ मैं मार्च कर रही थी, फिर भी? ख़ैर अब सब लोग जाग चुके थे। मीडिया अभी भी छाँव मैं खड़ी थी। क्यों खड़ी थी? किस बात का इंतज़ार हो रहा था? मुझे लगा के कुछ बढ़ा होने वाला है। फिर पुलिस और यूनियन की नोक झोंक होने लगी, यूनियन के अध्यक्ष का मत था के उन लोगों को गिरफ़्तार किया जाये। अगर आधे घंटे में यह नहीं हुआ तो हम गिरफ़्तारी देंगे। “चलिए न आमिर भाई हमें काम है”, मेरे दोस्त ने कहा। मैं सोच रहा था के जब तक मैं गंतव्य पर पहुचुँगा पुलिस लाठी चार्ज कर देगी और मीडिया भी छांव से निकल आएगी, साथ मैं कुछ भी लिख छाप देंगे। अब जब मैं यह लिख रहा हूँ तो लाठी चार्ज हो चुका है। पता चला है कि पुलिस ने मीडिया और लोगों से कैमरा छीने और फ़ुटेज डिलीट करवाया है। कईं लोग घायल हैं। मगर वह देशभक्त, भारत माता के लाल कहाँ हैं? क्या उनपर भी लाठी चार्ज हुआ? क्या उनका भी ख़ून बहा? मामला एक तस्वीर का है बस एक तस्वीर का। तस्वीर किसकी है? तस्वीर उसकी है जिसको गंगा जमुनी तहज़ीब का नायक कहा गया। क्या मामला सिर्फ तस्वीर का ही है? दोस्तों तस्वीर उसकी है जिसने बाल गंगा धर तिलक और भगत सिंह के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। मगर क्या यह कोई मुद्दा है? जिस जमीन पर हम खड़े हैं वह पवित्र ज़मीन है। यह हमारे पूर्वजों का ख़ून है । विचार कीजिये।

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