तराना-ए-मुहब्बत

सदाक़त का हाथों में परचम उठाये
तराने मुहब्बत के हम गुनगुनाएं
ज़मीं एक है आसमा एक अपना
हवा एक है गुलसितां एक अपना
तो आपस में क्यूँ दूरियां हम बढ़ाएं
सदाक़त का हाथों में परचम उठायें

ये मंदिर ये मस्जिद ये गिरिजा शिवाले
जहाँ है अक़ीदत वहां सर झुका ले
दीवाली हो या ईद मिलकर मनाएं
सदाक़त का हाथों में परचम उठायें

सभी से यही याहया का है कहना
पयामे मुहम्मद है मिल-जुल के रहना
सब अहले वतन बेटियों को पढ़ाएं
सदाक़त का हाथों में परचम उठायें

सदा आये शंखों से अल्लाहुअक्बर
गले से लगाए कन्हैया को अख़्तर
क़दम एकता का चलो हम बढ़ाएं
सदाक़त का हाथों में परचम उठायें

मोहम्मद याहया सैफ़ी
अध्यक्ष एम० ई० एस० ए० एस०
नूह,मेवात, हरियाणा

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