सर सैयद अहमद खां और 1857 ई० का विद्रोह

19वीं शताब्दी में भारत के मुस्लिम विचारों को और समाज सुधारकों में सैयद अहमद खां (1817-1898)  का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। सैयद अहमद खान का जन्म 17 अक्टूबर सन 1817 ई० में दिल्ली के एक कुलीन (ऊंचे कुल का समृद्ध एवं सम्मानित) परिवार में पिता सैयद मीर मुत्तक़ी के घर हुआ था। वह पिता की तरफ से हुसैनी सैयद हैं। और उनका संबंध पैगंबर हज़रत मोहम्मद साहब के नाती हज़रत इमाम हुसैन तक पहुंचता है। सैयद अहमद खां के परिवार का मुगल दरबार से निकट का संबंध था। इस परिवार के अनेक सदस्य शाही दरबार की सेवा में रहे थे और इस युग में दो महान सूफी संत शाह ग़ुलाम अली और शाह अब्दुल अज़ीज़ इन के आध्यात्मिक गुरु थे। इसलिए इस परिवार का दिल्ली के समाज में गहरा राजनीतिक प्रभाव एवं धार्मिक सम्मान था।

सैयद अहमद खान के परिवार का मुगल दरबार से निकट का संबंध होने के कारण उन्हें अपने युग के बड़े एवं योग्यतम विद्वानों से परंपरागत मुस्लिम शिक्षा पद्धति के अनुसार शिक्षा प्राप्त करने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ। इसी के साथ-साथ उन्हें मुग़लों की दिल्ली में शानदार परम्पराएं भी विरासत में मिली थी। यही कारण है कि उनका व्यक्तित्व साधारण एवं प्रभावशाली था। वह प्रारंभ से ही बड़े चिंतन एवं मननशील थे। फ़ारसी और अरबी की बहुत सी किताबें पढ़ने के बाद वे अपनी संस्कारजन्य रूचि के कारण गणित का अध्ययन करने की ओर प्रवृत्त हुए। उस समय गणित के अध्ययन एवं अध्यापन के लिए उन्हें ननिहाल (नाना पक्ष) के लोगों की बड़ी प्रसिद्धि थी। उनके नाना ख्वाज़ा फ़रीदुद्दीन अहमद असाधारण योग्यता के व्यक्ति थे। सैयद अहमद खान ने अपने मामा ख्वाज़ा ज़ैनुद्दीन (जो अपने पिता के ही समान बहुत प्रभावशाली और उनके अनेक विषयों के विद्वान थे) से गणित की शिक्षा प्राप्त की। सैयद अहमद खान के जीवन का तथा विचारों पर अपने मामा का अत्यंत प्रभाव पड़ा।

सैय्यद अहमद खां के चरित्र निर्माण में उनकी मां अज़ीज़ुन्निशा का विशेष योगदान है। उन्होंने सैयद अहमद खां को प्रारंभ से ही अनुशासन और शिष्टाचार का पाठ पढ़ाया था। मां के विशाल हृदय और धार्मिक प्रवृत्ति का सैयद अहमद खां के जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ा था। उनके चरित्र में उच्च आदर्श, मानववाद, सादगी, उदारता एवं सहनशीलता आदि मां के प्रभावस्वरुप ही पैदा हुए थे। यही कारण है कि सैयद अहमद खां जीवन पर्यंत ना केवल अपनी मां का सम्मान करते रहे बल्कि अपनी उनकी राय को विशेष महत्व देते रहे।

सैयद अहमद खान की औपचारिक पढ़ाई-लिखाई 18-19 वर्ष की आयु में समाप्त हो गई थी। लेकिन विभिन्न विषयों के अध्ययन में उनकी रुचि आजीवन बनी रही। अपने युग के प्रसिद्ध विद्वानों की संगत में भी उनकी दिलचस्पी रही। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध विद्वानों सहबाई, मिर्ज़ा ग़ालिब और आजुर्दा आदि से उनका व्यक्तिगत परिचय था। अकबर शाह द्वितीय के दरबार में सैयद अहमद खां को भारतीय नवजागरण के अग्रदूत और समाज सुधारक राजा राममोहन राय से भी मिलने का अवसर प्राप्त हुआ था। आप पर राजा राममोहन राय की विद्धता, गंभीरता, शिक्षा और विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। अतः अपने युग के महान विचारकों और श्रेष्ठतम परंपराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिभाशाली विद्वानों के प्रभावस्वरूप उनके जीवन के प्रति गंभीर और यथार्थवादी दृष्टिकोण बना।

पिता सैयद मीर मुत्तकी के निधनोपरांत, 22 वर्ष की अवस्था में अपने सगे-संबंधियों के सलाह-मशविरे के बावजूद आपने किले की नौकरी को महत्व ना देकर ईस्ट इंडिया कंपनी की नाइब (सहायक) मुंशी की नौकरी को महत्व दिया। उन्हें फरवरी 1839 ई० में कंपनी सरकार की नाइब (सहायक) मुंशी की नौकरी प्रारंभ करने के साथ ही मुंसिफी (न्याय, इंसाफ़) से संबंधित दीवानी के कानूनों का खुलासा किताब के रूप में पेश किया। इसी पुस्तक के कारण कमिश्नर आगरा ने आपको मुंसिफी (न्याय, इंसाफ) के पद के लिए सिफारिश की। लेकिन इसी बीच मुंसिफी (न्याय, इंसाफ) के लिए प्रतियोगिता परीक्षा व्यवस्था लागू हो गई। उन्होंने अपनी इसी पुस्तक और विलक्षण प्रतिभा के कारण मुंसिफी (न्याय, इंसाफ) की प्रतियोगिता परीक्षा में मुंसिफी (न्याय, इंसाफ) के पद पर नियुक्त हुए। सन 1842 ई० में मैनपुरी से तबादला (स्थानांतरण) हो गया और फतेहपुर आ गए।

सन् 1845 में बड़े भाई की मृत्यु के बाद सैयद अहमद खां दिल्ली आ गए। बड़े भाई की मृत्यु के बाद उनका जीवन के प्रति दृष्टिकोण ही बदल गया। इस दुखद घटना से उनमें बड़ा परिवर्तन आया। महफिलों, राग-रंग और संगीत आदि से उनका मन उचट गया। सन 1854 ई० तक वह दिल्ली में ही रहे। इस बीच उनके अध्ययन का सिलसिला जारी रहा और प्रसिद्ध विद्वानों से फ़िक़ह, हदीस, क़ुरान की शिक्षा लेकर सनद (प्रमाण-पत्र) हासिल की।

इसी काल में में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति “असरारुस्नादीद” (पूर्वजों की निशानियां) लिखी। इस पुस्तक में सैयद अहमद खां ने दिल्ली की 232 ऐतिहासिक इमारतों को इतिहास कत्बा (शिलालेख) और मानचित्र प्रस्तुत किए। इसी पुस्तक के कारण उन्हें ‘रॉयल एशियाटिक सोसाइटी लंदन’ का फेलो बनाया गया। हिंदी साहित्य के पहले इतिहास लेखक गार्सा द तासी ने इस पुस्तक का फ्रांसीसी भाषा में अनुवाद किया। यह पुस्तक फ्रांसीसी भाषा में सन 1861 ई० में प्रकाशित हुई।

जनवरी सन 1855 ई० में सर सैयद अहमद खां का तबादला (स्थानांतरण) बिजनौर हो गया। 1857 ई० की क्रांति से पहले 2 साल बिजनौर में रहते हुए उन्होंने दो महत्वपूर्ण पुस्तकें तैयार की। पहली अबुल फजल की प्रसिद्ध पुस्तक ‘आईने अकबरी’ और दूसरी ‘तारीख-ए-बिजनौर’। बिजनौर प्रवास के दौरान सर सैयद अहमद खां ने जन कल्याण के कार्यों में भी गहरी रुचि ली। इसी कारण वह जनता के बीच काफी लोकप्रिय हो गए।

सर सैयद अहमद खां को बिजनौर में रहते हुए केवल 2 वर्ष 4 महीने ही हुए थे कि देश में 1857 की क्रांति की आग भड़क उठी। 10 मई 1857 ई० को मेरठ में सैनिकों द्वारा क्रांति का प्रारंभ हुआ। सैनिकों ने अपने ब्रिटिश अफसरों को मारने के बाद दिल्ली की ओर कूच किया। दिल्ली पहुंच कर उन्होंने अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर को नेतृत्व प्रदान करने के लिए राजी कर लिया और देखते-देखते ही क्रांति की ज्वाला बड़े क्षेत्र में फैल गई। दिल्ली में क्रांति की आग भड़कने के 2 दिन के अंदर ही बिजनौर तक फैल गई। उस समय अनेक अंग्रेज अफसर बिजनौर में खतरे में घर गए। सर सैयद अहमद खां ने अपने जीवन को संकट में डाल कर अंग्रेजों की जान बचाई।

सन 1857 की क्रांति ने देश के सभी वर्ग के लोगों ने विदेशी शासन के विरुद्ध भाग लिया। इस क्रांति में उलेमा, जनसाधारण, राजा, नवाब और फ़क़ीर आदि सभी सम्मिलित हुए। लेकिन एक ऐसा वर्ग भी था जो जरूरत महसूस नहीं करते थे। उनके लिए मुसलमान होना ही अपराध था। इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए मौलाना ख्वाज़ा अल्ताफ हुसैनी ‘हाली’ ने लिखा है- “हिंदुस्तानी खैरखाही सरकार की आड़ में मुसलमानों से दिल खोलकर बदले ले रहे थे और अगले-पिछले बुग्ज़ (द्वेष) निकाल रहे थे। मुसलमानों को मुजरिम करार देने के लिए कोई सबूत दरकार (वांछित) नहीं था। उनका मुसलमान होना ही उनको मुजरिम ठहराने के लिए काफी था।” (मौलाना ख्वाज़ा अल्ताफ हुसैन ‘हाली’- हयात-ए-जावेद, पृ० 94)। यही कारण था कि इस जनक्रांति से जानी (प्राणों) व माली (राजस्व) नुकसान सबसे ज्यादा मुसलमानों का हुआ। जैसा के जवाहर लाल नेहरू ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि “क्रांति को कुचलने के उपरांत ब्रिटिश सरकार ने हिंदुओं के मुकाबले मुसलमानों का दमन अधिक किया।” (जवाहरलाल नेहरु, डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया। जवाहरलाल नेहरु मेमोरियल फंड-दिल्ली 1889 , पृ० 347)। धैर्य और गंभीरता का परिचय देते हुए सर सैयद अहमद खां ने की क्रांति के कारणों पर अपनी दो महत्वपूर्ण पुस्तकों ‘असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिन्द’ एवं ‘तारीख़-ए-सरकशी-ए-बिजनौर’ में व्यापक रुप से प्रकाश डाला है। ऐसे दौर में जबकि मुसलमान तबाह व बर्बाद होकर चारों तरफ से घिरा हो, मुसलमानों की तरफदारी में कुछ कहना और ग़दर (संग्राम) के लिए ब्रिटिश सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराना बड़े ही साहस का काम था।अतः 1857 जैसे जोखिम भरे विषय पर लिखना बड़ी बात थी। इस विषय में मौलाना ख्वाज़ा अल्ताफ हुसैन ‘हाली’ ने लिखा है कि “जब सर सैयद अहमद खां ने इस पुस्तक को पार्लियामेंट और गवर्नमेंट ऑफ इंडिया में भेजने का इरादा किया तो उनके दोस्त मना करने आए और मास्टर रामचंद्र के छोटे भाई शंकरदास जो उस समय मुरादाबाद में मुंसिफ (दंडाधिकारी) और सर सैयद अहमद खां के गहरे दोस्त थे, ने कहा है कि “इन पुस्तकों को जला दो और अपनी जान को खतरे में मत डालो।” (मौलाना अल्ताफ हुसैन ‘हाली’, हयात-ए-जावेद, पृ० 95) लेकिन सर सैयद अहमद खां ने कहा कि मैं इन बातों को गवर्नमेंट पर ज़ाहिर करना देश और देशवासियों और स्वयं गवर्नमेंट की भलाई समझता हूँ। उपर्युक्त तथ्यों से किताब की महत्ता सिद्ध हो जाती है। सर सैयद अहमद खां ने अपनी ‘असबाब-ए-बगावत-ए-हिंद’ नामक पुस्तक में विद्रोह के लिए निम्नलिखित बिंदुओं को मुख्य कारण बताया है।

1- कंपनी सरकार ने भारतीयों की तरफ ध्यान नहीं दिया और ना ही जनता से कोई संबंध स्थापित किए। इसीलिए काफी दिनों से भारतीय जनता के दिलों में ईस्ट इंडिया कंपनी के विरोध की ज्वाला भड़क रही थी।

2-ईसाई पादरियों द्वारा लालच व धमकी से धर्म परिवर्तन तथा अंग्रेजों द्वारा लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहन देने और अंग्रेजी स्कूलों से पढ़े-लिखे नौजवानों की नौकरी में बढ़ावा देना। अंग्रेजों के रस्मो रिवाज़ आदि का भिन्न होना। लेजिस्लेटिव कॉउंसिल में भारतीयों को उचित प्रतिनिधित्व न देना। ज़मीदारी-ताल्लुकेदारी की नीलामी करना और नवी भूमि-व्यवस्था को सख़्ती के साथ लागू करना।

3- कंपनी सरकार द्वारा जनता और उनकी समस्याओं की तरफ तक ध्यान ना देना बताया। कंपनी के बॉण्ड द्वारा क़र्ज़ और उसकी वसूली ने हिंदुस्तानियों की आर्थिक स्थिति को जर्जर कर दिया। इसलिए सरकार की इस आधुनिक प्रवृत्ति के विरुद्ध जनता में प्रतिकार की भावना पैदा होना स्वाभाविक था।

4- हिंदुस्तानी कुटीर उद्योग को बर्बाद कर विशेषकर भारतीय कपड़ा उद्योग की तबाही और बर्बादी पर विशेष बल देना इसी के साथ-साथ अंग्रेज अफसरों को विशेष सम्मान देने और भद्र कुलीन (उच्च) एवं शरीफ हिंदुस्तानियों का सम्मान न करना। इस वजह से विशेषकर मुसलमान नाराज़ हो गए और उन्होंने इस क्रांति में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।

5- फ़ौज की बदइंतजामी (कुप्रबंध) और अनुशासन का कमजोर होना। सर सैयद अहमद खां का कहना है कि अगर कंपनी सरकार हिंदुओं और मुसलमानों को अलग-अलग पलटनों (फौज़ी टुकड़ी) में रखती तो उनके बीच एकता ना होती और ना ही आपस में संबंध बनते।

सर सैयद अहमद खां ने अपनी असबाब-ए-बगावत-ए-हिंद नामक पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद करा कर 500 प्रतियां ब्रिटिश पार्लियामेंट में भेजीं। पुस्तक में विद्रोह के कारणों पर गहराई से विचार किया गया था। इसीलिए ब्रिटिश पार्लियामेंट में इस पुस्तक पर बहस हुई और आखिरकार सर सैयद अहमद खां के मशवरों से फ़ायदा उठाते हुए हिंदुस्तानियों को लेजिस्लेटिव कॉउंसिल का सदस्य मनोनीत किया गया।

सर सैयद अहमद खां ने अपनी अभूतपूर्व साहित्यिक प्रतिभा का परिचय देते हुए 1857 ई० के विद्रोह में ब्रिटिश शासन अधिकारियों के प्रतिशोध के शिकार बने मुसलमानों की छवि को सुधारने का इस पुस्तक द्वारा प्रयास किया। यह पुस्तक इस दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सर सैयद अहमद खां ने इसे उस वक्त लिखा जब ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों के विरुद्ध एक शब्द मुंह से निकालना मौत की दावत देना था। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस पुस्तक के द्वारा सर सैयद अहमद खां मुस्लिम समुदाय को 1857 के विद्रोह के बाद निराशा, विषाद और कुंठा आदि से

निकालने में कामयाब हुए। 1857 के विद्रोह की घटनाएं इतिहासकारों के लिए विवाद का विषय रही हैं। ‘असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिंद’ पुस्तक के बावजूद अपनी विशेषताओं और सीमाओं के इतिहासकारों और प्रबुद्ध पाठकों को तत्कालीन घटनाओं के मूल कारणों के विषय में जानने में सहायक हैं। औपनिवेशिक सरकार की नीतियों के प्रभावों और विद्रोह के अंतः संबंधों के विश्लेषण में यह पुस्तक हमारे सामने अनेक तथ्यों को उद्घाटित करती है।

तरन्नुम परवीन

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