औरत— एक विस्थापित!

Spread the love

धर्म, संपत्ति, विधि सम्मत तरीकों से उजड़ती अथाह स्त्रियां पारिवारिक पुनर्वास के लिए पीढ़ी दर पीढ़ी तैयार की जाती रहीं हैं । उनके लिए विवाह के दोनों सिरों पर बवालेजान इतिहास और कृत्रिम भूगोल रहे हैं । एक से भौतिक विस्थापन तय है और दुसरे से में अवैज्ञानिक पुनर्स्थापन ।

बुर्जुआ समाज में भी परिवार के भीतर उसकी पारम्परिक भूमिका-सुलभ श्रम एवं यौन-निर्वाह का ही विस्तार बाहरी समाज में उसके कामकाज की औकात और पद्धति को भी निर्धारित करता आ रहा है; काम मेहनताने से यौन शोषण तक । जो घर की चौखट के अंदर वही बहार भी । औरतों के सन्दर्भ में तमाम सांस्कृतिक साहित्य, परिवार के नेपथ्य से पूरक नगाड़े सा प्रायः उन्ही भौतिक स्थापनाओं एवं रचनाओं के समर्थन में बजट रहा है जो औरत को पारिवारिक विस्थापन में जकड़ने का काम करती आयी हैं ।

सामंती समाज की घरेलु नारी के चित्रण से लेकर यूं साहित्य का तेवर, उसकी भंगिमा, बराबर विद्रोही जैसी मिलेगी; परिवार के तमाम ऐसे कार्यकलाप, जो औरत की ज़िन्दगी को दुष्कर कर देते हैं. जम कर दुत्कारे जाते मिलेंगे । पर इस लिहाज़ से कि परिवार के मूल चरित्र पर सवाल न आये । इस तरह रोग के लक्षणों से तो साहित्य को वास्ता है, रोग की जड़ से नहीं । परिवार में औरत करुणा, दया, विलास, वात्सल्य, ममता, स्वार्थ, छल, कुटिलता, ऐंद्रिकता, त्याग, जैसे तमाम भावों में विस्थापित मिल जाएगी, पर मैत्री-भाव में नहीं और हक़-भाव में भी नही । पारिवारिक ढांचा, जो इसे तय करता आ रहा है, उसके तीन प्रमुख अव्यव तत्त्व रहें हैं— सामाजिक सरोकारों के ऊपर व्यक्तिगत स्वार्थ (संपत्ति) को तरजीह, मानवीय हक़ों की कीमत पर वंशानुगत अधिकारों को मान्यता तथा प्रेम के नाम पर बंधुआ सेक्स । परिवार से सम्बंधित सारे क़ायदे-क़ानून इन्ही अवयवों की रक्षा में हैं इन अवयवों के कमज़ोर पड़ने या टूटने से परिवार बिखर जाता है, और क्योंकि परिवार का बिखरना स्त्री के लिए अपने आप में कोइ राहत पहुँचाने वाला विकल्प नहीं है, लिहाज़ा परिवार के उसी ढाँचे के पक्ष में फिर भी बहुत कुछ कहा जा सकता है । विस्थापित औरत को लेकर साहित्य इसी परधि में बंधा हुआ है-जैसे चक्की आगे बढ़ती है, जैसे कोल्हू आगे चलता है — लौटकर फिर से शुरू होने के लिए । परिवार निरंतर चलता रहता है । औरत आती जाती रहती है ।

परिवारों की तुलना ऐसे राहत-शिविरों से की जा सकती है, जो आमतौर पर कभी न समाप्त होने वाले हैं  । जैसे विस्थापितों के लिए बनाये गए शिविरों की त्रासदी पर इन बातों का कोई फर्क़ तो पड़ेगा कि वहां सुविधाएं केसी हैं, शरणदाता का स्वार्थ उनका स्वागत किस सीमा तक करने में है, उनके मूल स्थान कि परिस्थितियां अनुकूल हैं या प्रतिकूल; पारिवारिक विस्थापन झेलती स्त्रियों के साथ भी ज़्यादातर ऐसा ही है—कुछ को जीवन काटने के सहारे हासिल हो जातें हैं, कुछ का जीवन काटे नहीं कटता । उनकी परिस्थिति-भिन्नता उसी तरह है जैसे भारत में शरण पाया कोई तिब्बती विस्थापित किसी ‘घुसपैंठिये’ बांग्लादेशी से भिन्न समझा जाता है जैसे कश्मीरी पंडित विस्थापितों को कश्मीरी मुस्लिम विस्थापितों से अलग व्यवहार मिलता है । समाज में विस्थापितों की भाँति, परिवार में स्त्रियों की सोच, प्रतिभा, रुझान, पसंद, पहल सभी औरों द्वारा नियंत्रित स्थितियों की मोहताज हैं ।

परिवार में औरतों को काम की आज़ादी नहीं होती है और यौन की आज़ादी नहीं है । यदि वह बाहर काम कर रही हो तो भी निश्चित घरेलू कामों से उसका छुटकारा नहीं और उसके यौन पर तो पति का एकाधिकार निर्विवाद है । ऐसे में पारिवारिक ढाँचे से औरत के विद्रोह के स्वभाविक रूप श्रम एवं यौन सन्दर्भ होते हैं पर विद्रोह के लिए नहीं, और जब विद्रोह होता है तो सन्दर्भ नहीं होते । यही नहीं, जब परिवार की औरत विद्रोह की मुद्रा में तपती भी है तो सांस्कारिक छांह से निकले बिना । हिंदीे साहित्य में विद्रोह का सबसे तीखा बिगुल बजाया था साठ के दशक में कृष्णा सोबती ने और प्रितिनिधि परिवार के गलियारों में गूंजती रही ।

परिवार कि पारम्परिक दहलीज़—मेरे घर पराये मर्द की परछाई भी नहीं—में न सिमटने वाली मंझली बहू ‘मित्रो मरजानी’ का टंटा है कि ‘तन उसके तो ऐसी प्यास व्यापती है कि सौ घट भी थोड़े ।’ यौन पिपासा के हाथों मजबूर, अपने यौन की आप मालिक नहीं—ऐसी है बोली-ठोली में तेज़ तर्रार, उठते बैठते चहकती-कुहकती, पति की मार के सामने बिफरकर सिर ऊँचा रखने वाली मित्रो का यौन विद्रोह, जो उसे रंगरलियां मनाने के लिए व्यभिचारिणी मान के घर पहुंच देता है । मित्रो जिस परिवार में ब्याही गयी थी उसकी औरतें घर के सारे काम करतीं हैं, मर्दों की सेवा टहल में लगीं रहतीं हैं, परिवार के लिए संतान (हो सके तो लड़का) पैदा करतीं हैं । मित्रो को भी यह सब स्वीकार्य है और जब मित्रवत माँ का अकेलापन उसे डराता है तो अंत में पति के पारिवारिक पहलु में ही वह भी धन्य होती है—’सैयां के हाथ दाबे, पाँव दाबे, सिर-हथेली ओठों से लगा झूठ मूठ की थू कर बोली- ‘कहीं मेरे साहिबजी को नज़र न लग जाए इस मित्रो मरजानी की!’ यह वही मित्रो है जिसकी पारिवारिक यौन-कर्म को लेकर समझदारी का आलम ये भी है—’जिंद-जान का यह कैसा व्यापार? अपने बीज डालें तो पुण्य, दूजे डालें तो कुकर्म ।’

उस घर के मर्द एक से एक शरीफ, औरतों को, मित्रो समेत, फिर भी परिवार के नियम-क़ानूनों से बंधा हुआ होना ही है । दरअसल मर्द रोगी परिवार का वाहक है, रोग नही । जैसे पारम्परिक समाज में औरत को तलाश अच्छे परिवार कि मार्फ़त अच्छे मर्द की रही है, उसी तरह विद्रोही साहित्य में तलाश है अच्छे मर्द कि मार्फ़त अच्छा परिवार बसाने की । एक तरह से यह सामंती मूल्यों के परिवार से बुर्जुआ मूल्यों के परिवार में परिवर्तन की गाथा भी है । तो भी परिवार रहे विस्थापन शिविर ही औरत के लिए, समाज में भी, साहित्य में भी । औरत के श्रम, यौन, संपत्ति एवं वंश के वही पुराने समीकरण हैं ।

 

कृष्णा सोबती की दुनिया छोड़ती बीमार माँ एवं अविवाहित रही बेटी के बीच की मित्र-भाव की अंतरंग कहानी ‘ऐ लड़की’ में तो पुरुष पात्र है ही नहीं, पर माँ कि स्मृति पर पुरुष का संचालित परिवार ही छाया हुआ है—’मर्द का दबदबा रहना ही चाहिए ।’ जैसे कोई विस्थापित पीछे छूटी दुनिया और नयी दुनिया के बीच झूलता रहता है, मौत की और बढ़ रही माँ पीहर और ससुराल की तुलना करती है—’बराबरी की बात मैंने इनके (पति के) घर आकर सीखी-समझी । इनके घर में लड़की-लड़के में कोई भेदभाव नहीं था ।’ लड़की, तुम्हारे नाना के यहाँ लाड-प्यार-चाव की कमी नहीं थी । पर कहीं एक गहरी लकीर खिंची पड़ी थी लड़के और लड़की में!…… सच तो यह है कि लड़कियों को तैयार ही जानमारी के लिए किया जाता है— भाई पढ़ रहा है, जाओ दूध दे आओ । भाई सो रहा है । जाओ कंबल उड़ा दो । जल्दी से भाई को थाली परस दो । उसे भूख लगी है । भाई खा चुका है । लो, अब तुम भी खा लो ।’ पर कोई भेदभाव न करने वाला पति का घर भी ऐसा कि ‘सब की खूबियां निगल जाता है यह परिवार । …. गृहस्थी के पांव रखकर स्त्री का जो मंथन-मर्दन होता है, वह भूचाल के झटकों से कम नहीं होता ।’

औरत सहन कर लेती है क्योंकि उसे सहन करना पड़ता है । औरत को सहन करना पड़ता है जैसे हर विस्थापित को करना पड़ता है । उसका वक़्त भी तभी आएगा जब औरत विस्थापित नहीं रह जाएगी । ‘ऐ लड़की’ की मां बेटी स्वतंत्र हैसियत की खुद्दार व्यक्तित्व वाली औरतें हैं । परिवार के खाते में श्रम, यौन एवं वंश के पराश्रित योगदान से भी सामर्थ्य खींचने के बीच माँ—’हाँ, सोच कर बताओ कि जरूरत पड़ने पर आवाज किसे दोगी!’ लड़की लंबी चुप्पी के बाद—’मैं किसी को नहीं पुकारती । जो मुझे आवाज देगा, मैं उसे जवाब दूंगी ।’ अंत आते-आते—’लड़की! अकेले कैसे करोगी ।’ ‘जैसे भी चल निकले, अम्मू!’ जीवन के प्रति इस जीवट समझदारी की कोख में ही पारिवारिक परंपरा की हूक छिपी हुई है— ‘जैसी मेरी आंखों में पहुंचा रही हो, ऐसी ठंडक तुम्हें कभी मिली? मां से सच-सच कहना ।’

परिवार में विस्थापित औरतों की स्थिति मर्द के रवैय्ये, संयुक्त परिवार या बदलते परिवार का ही सन्दर्भ नहीं है । यह उत्पादन-यौन-श्रम-संपत्ति-वंश और औरत की स्वतंत्र हैसियत का मुद्दा है, जोपरिवारिक ढाँचे एवं मूल्यों में क्रांतिकारी परिवर्तनों का मोहताज है । अन्यथा ‘ऐ लड़की’ कि अनुभवी माँ परिवार में औरत की स्थिति का निचोड़ बताती है—’शादी के बाद औरत पूरे परिवार के लिए शिकारे की मांझी बन जाती है । झील में तिरती नाव और और शिकारे तो देखें हैं तुमने! उन पर सवार परिवार मजे-मजे झूमते हैं और चप्पू चलाती हैं औरत । उम्र भर चलाती जाती है ।’ और जैसे कोई विस्थापित नए समाज में जगह बनाने के लिए जद्दोजिहद करता है, ‘वह औरत क्या जो बेटे की मोह को पछाड़ सके ।’ नए परिवार में—’घरवालियां हाथ में छलनी लेकर बैठती हैं । निकालती रहती है कंकर । यह निकाल । वह निकाल ।’

औरत के लिए समाज में स्वतंत्र एवं समर्थ व्यक्तित्व हासिल करने के बंद रास्तों के बीच एकमात्र ‘मर्यादित’ विकल्प रहा है कि विवाह की गली से गुजर कर ‘अच्छा’ परिवार हासिल किया जाए । परिवार में सुख या दुख, मान या अपमान, स्थापना या दुराव, अनिश्चितता के गर्त में रहता है, पर समाज से औरत के विस्थापन पर मुहर लग चुकी होती है ।

‘हम लड़कियां हैं, हमारा घर कहीं नहीं होता ।’ छोटी बहन से मुखातिब उद्ग़ार थे प्रेमचंद की ‘निर्मला’ के, जैसे ही उसे अपनी शादी तय होने की खबर मिली । स्वप्न में स्थितियों की तुलना करती है— अंधेरी रात में अकेली वह नदी के किनारे चिंता में है कि कैसे पार घर पहुंचे । एक सुंदर मजबूत नाव आती है पर मल्लाह उसे नहीं बैठने देगा क्योंकि नाव उसके लिए नहीं है । फिर एक टूटी सी डोंगी आती है जो उसके लिए है । निर्मला सोचती है कि अकेली पड़ी रहकर किसी जंतु का शिकार बनने से तो अच्छा है उस डोंगी पर ही भरोसा करना, शायद पार लग जाए । कुछ देर तक तो डोंगी डगमगाती चलती है पर प्रतिक्षण उसमें पानी भरता जाता है— अब डूबी कि तब डूबी । ‘नाव नीचे से खिसक जाती है और उसके पैर उखड जाते हैं ।’ इस विद्रोही समझदारी के बावजूद जब निर्मला की शादी बाप की उम्र वाले से ही होती है तो वह पूरी तरह मन मारकर नए परिवार में गृहस्थन के कर्तव्य का बीड़ा उठाया बे—तारतम्य स्पंदनहीन जिंदगी जीती चली जाती है । ऊब, शक़, योन-कुंठा, विमातापन, फरेब, कलह-चुगली एवं खूसट-नीरस दाम्पत्यपने से भरा उसका परजीवी पारिवारिक रिश्ता उसके सुख-शांति की कुंजी है— औरत का अपना शोषण के प्रति एक तरफा चुप्पी भरा समर्पण । विपरीत परिस्थितियों में सौतेला-आज्ञाकारी बेटा सियाराम तक कच्ची उम्र में विद्रोह कर सकता है ‘मैं नहीं जाता बाजार, किसी का नौकर नहीं हूं । आखिर रोटियां ही तो खिलाती हो या और कुछ? ऐसी रोटियां, जहां मेहनत करूंगा, वहां मिल जाएंगी । जब मजूरी ही करनी है, तो आपकी ना करुंगा ।’ पर निर्मला ताजिंदगी पारंपरिक शोषण प्रणाली को गौरवांवित करेगी । ‘घर का काम करना तो मजूरी नहीं कहलाती ।’ पारिवारिक विस्थापन के इस शिकार की मुक्ति प्रेमचंद्र ने भी मौत द्वारा ही कराई है और उस घड़ी में भी वे पति की छत्रछाया डालनी नहीं भूले जब अंत में अभाव में सिसकती निर्मला ने दम तोड़ा तो प्रश्न उठा के पति की अनुपस्थिति में दाह कौन करेगा? तब महीनों के से पत्नी और बच्चों को भाग्य भरोसे छोड़ कर लापता पति एक बकुचा लटकाये आकर खड़ा हो गया— परिवार के लहजे से संतोषप्रद अंत । निर्मला की छय और परिवार की जय; बल्कि जय के लिए छय ।

साहित्य से औरत की बदहाली के रूप में पेश करता है वह साहित्य की अपनी कमी है । औरत को उसी परिवार और उसी समाज के एक सहज अंग के रूप में पेश किया जाता है, जहाँ उसकी हैसियत विस्थापित की है । लिहाज़ा, जो-जो औरत भुगतती है वही साहित्य की जांच का विषय बनता है; न कि पारिवारिक ढांचा या सामाजिक व्यवस्था । अपनी विद्रोही औरतों द्वारा साहित्य अमूमन क्या हासिल कर रहा है, सिवाय उसी परिवार में थोड़ी ज्यादा ऊंची आवाज के और उसी समाज में थोड़ा स्वीकृत स्पेस के । अपूर्वा (‘सबसे उदास कविता’—स्वदेश दीपक) तो क्रांति की राह पर वर्ग शत्रुओं में सफाई में लगी है पर अपनी रक्षा के संदर्भ में उसे भी चाहिए माँ जाए सात भाई और उसकी कसक है की क्रांति में न उलझी होती तो डॉक्टर सुकांत का घर बसा पाती । ‘एक लड़की की जिंदगी’ (क़ुर्रतुल एन हैदर) दूसरी शादी करने वाले पति से तलाक पाने की उम्मीद लगाने से लेकर प्रेमी इरफान को शौहर के रूप में पाने की नाकाम हसरत तक सीमित है । सीता रामचंदानी भारत विभाजन की कोई साधारण सिंधी शरणार्थी लड़की नहीं है; वह पढ़ी-लिखी, दौलत-हुनरमंद, पैसे वाली, विलायत रही एवं यौन स्वछन्द महिला है जो अपनी मर्जी की मालिक है । पर उसकी मर्जी? उपन्यास के अंत में उसे तलाक का कागज़ मिलने— पर अब तक वह कानूनी तौर पर मिसेज जमील थी मगर जबकि यह कागज अमेरिका से आ चुका है, उसको मिसेज इरफान कहलाने का हक कोई उससे नहीं छीन सकता । इरफान अब उसका आशिक नहीं होगा…. उसका शौहर होगा । मजाजी खुदा-देवता… सब रिश्तो से उत्तम, पवित्र, खूबसूरत, प्यारा रिश्ता…. उसका कानूनी शौहर…..।’ निर्गुणिया ब्राह्मणी (‘नाच्यो बहुत गोपाल’-अमृतलाल नागर) ने तो धर्म या जाति की दीमक लगी दीवार ही नहीं गिराई बल्कि वर्ग के लौह-कपाट तक तोड़ डाले— सिर्फ इसलिए के मन भाए पति के लिए बच्चे पैदा करे ।

पारिवारिक शालीनता के दायरे में क़ैद औरत का न अपना सामाजिक व्यक्तित्व होता है, न उसकी प्रत्यक्ष सामाजिक उपयोगिता— जैसे लंबी अवधि के विस्थापितों की जिंदगी । घर की सीमित स्थितियों में उसे अरमान पूरे करने हों या अपने लिए जगह बनानी है तो प्रपंच भी रचना पड़े, वह बेशक रचेगी । प्रायः साहित्य में तिरिया चरित्र का बखान मिलेगा पर उसमें औरत के विस्थापन-प्रसंग नदारद होंगे । पर समाज स्थल नहीं रहा है । इस बीच समाज में पारिवारिक बदलाव की स्थितियां बनी हैं, औरत के पक्ष में मजबूत हुई हैं । साहित्य ने इसका कितना नोटिस लिया है? ‘ऐ लड़की’, मां कबूलती है— ‘चलाई होती न परिवार की गाड़ी तुमने भी, तो अब तक समझ गई होती कि गृहस्थी में सारी शोभा नामों की है । इसकी पत्नी है, बहू है, मां है, नानी है, दादी है! फिर भी वही खाना, पहनना और गहना । लड़की, वह नाम की महारानी है । सब कुछ पोछ-पाछ के उसे बिठा दिया जाता है, अपनी जगह पर!’ अगले जन्म में माँ फिर भी उसी परिवार में आना चाहती है—’ मेरा अपना बनाया हुआ परिवार जहां सुरक्षित है तो भला मैं क्यों किसी दूसरे घर का दरवाजा

ढूंढने लगी । मरती हुई निर्मला अपने अबोध बच्ची को विधवा ननद के हवाले कर जाती है, इसी अंतिम निचोड़ के साथ कि ‘चाहे कुंवारी रखिएगा, चाहे विष देकर मार डालिये, पर कुपात्र के गले न मढ़िएगा । ज़ाहिर है साहित्य के सामने, विस्थापित के हक में, तय करने का लंबा सफर पड़ा है ।

विकास नारायण राय

Loading...

शायद आपको ये भी अच्छा लगे लेखक की ओर से अधिक

Loading...