अख़ूवत (भाईचारा)

वहां पर हिंदू मुस्लिम शिया सुन्नी बहुत ज़्यादा थे

मगर इन्सान कम थे

मैं मस्जिद और मंदिर में गई तो थी

मगर फिर डर के वापस लौट आई

मैं नादां हूं

नही है इल्म कुछ मुझको

समझ मे ये नहीं आया

वहां मंदिर का मस्जिद का

ना जाने कौन हाकिम हो

कितना ज़ालिम हो

कहीं ऐसा ना हो के शिया सुन्नी,सुन्नी शिया

या फिर कोई हिंदु ही मुस्लिम समझ कर जान ना ले ले

कभी आओ मेरे आंगन

तुम्हें कुछ दर्स देने हैं

मुहब्बत के अमन के और चाहत के

अख़ुवत तुम ने तो ऐसी कभी देखी नही होगी

नमाज़ों मे ना जलसों में

ना रंगोली ना होली में

यहां सब हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई आते जाते हैं

यहां तफ़रीक़ ज़ातों की कभी देखी नहीं जाती

यहा कोई ना शिया है ना सुन्नी है

ब्राह्मिन है ना खत्री है

यहां पर देहरियों का भी चलन रहता है अक्सर

कभी आओ तो कोठे पर

तुमहें अल्लाह यशु ओर राम के सब चाहने वाले

मेरे बिस्तर मेरी आग़ोश में लिपटे मिलेंगे..!!

 

डॉ० मुजाहिद मुग़ल

सहायक प्रोफ़ेसर,

सरकारी डिग्री कॉलेज, पुंछ

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