क़ौमी एकता

नही ऐसा नहीं करना कभी ऐसा नहीं करना।

धर्म के नाम पर यारो कभी झगड़ा नही करना।

मेरे पुरखो ने अपनी जान की कुर्बानियां दी हैं।

वतन की शानो शौकत का कभी सौदा नही करना।

सभी मज़हब के लोगों का लहु शामिल है धरती में।

कभी मंदिर कभी मस्जिद कभी गिरजा नहीं करना

बड़ी मुश्किल से गुलशन को निखारा है लहु देकर।

मेरी सबसे गुज़ारिश है इसे मैला नहीं करना।

सभी मिल कर रहें इक साथ था ये ख्वाब पुरखों का।

तुम उनके ख़्वाब को आही कभी रुसवा नहीं करना।।

आही नदीम बारी

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