हमारी संस्कृति!

तल्हा मन्नान ख़ान

कठुआ से लेकर उन्नाव और अब मंदसौर से लेकर लखनऊ, एक बड़ी फ़हरिस्त हमारे सामने है जो एक समाज के रूप में हमारा मुंह चिढ़ा रही है, एक सशक्त लोकतंत्र के रूप में हमारी विफ़लता को दिखा रही है। थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के सर्वेक्षण के अनुसार हमारा देश महिलाओं के लिए विश्व का सबसे असुरक्षित देश है। बीबीसी के दो साल पहले के एक सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश में हर तेरह मिनट में एक महिला का बलात्कार हुआ है, हर दिन एक महिला का सामूहिक बलात्कार हुआ है, हर उनहत्तर में दहेज के लिए एक महिला की हत्या हुई है और हर महीने उन्नीस महिलाएं तेज़ाब के हमले का शिकार हुईं हैं। यह हैं हम! जो विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता होने का दावा करते हैं।

मैं कभी-कभी सोचता हूं कि यह भीड़ जो अफ़वाहों की बुनियाद पर चलते-फ़िरते लोगों की जान ले लेती है, जो ‘संस्कृति’ की रक्षा के नाम पर निर्दोषों के ख़ून की प्यासी हो जाती है, यह तब सड़कों पर क्यों नहीं आती जब देश की किसी बेटी के साथ यह जघन्य कृत्य सामने आते हैं? कहां चले जाते हैं चैनलों के एंकर जो बेशर्म होकर लोगों की हत्याएं जस्टिफ़ाई करते हैं? कहां चले जाते हैं वे कवि और लेखक जो मंचों पर चढ़कर राजनीतिक दलों की चाटुकारिता करते नहीं थकते?‌ Abhisar Sharma कहते हैं कि अब हम ‘भीड़तंत्र’ से ‘भेड़तंत्र’ में परिवर्तित हो रहे हैं। हमें जिधर चाहे हांक दिया जाता है और हम चले जाते हैं। हम नागरिक के तौर पर, इंसान के तौर पर धीरे-धीरे मर रहे हैं। हम पीड़ित या अपराधी के मज़हब को देखकर अपना मत तय करते हैं। यह सबूत है इस बात का कि राजनीतिक दलों ने इस हद तक हमें जकड़ रखा है कि हम उनकी विचारधाराओं से ऊपर उठने के बारे में सोचते भी नहीं।

मैं जिस धर्म का अनुपालन करता हूं, वह मुझे सिखाता है कि अगर आप बुराई को होता हुआ देखें तो उसे हाथ से रोकने की कोशिश करें, यह नहीं कर सकते तो मुंह से उसे बुरा कहें, उसके ख़िलाफ़ बोलें और अगर इतनी क्षमता भी नहीं है तो कम से कम अपने दिल में उसे बुरा जानें। मैं समझता हूं कि अभी इतनी बुरी स्थितियां नहीं आईं हैं कि हम किसी बुराई को दिल में बुरा जानकर बैठ जाएं। हम ताक़त से उसे नहीं रोक सकते तो मुंह से उसके ख़िलाफ़ बोलें और खुलकर बोलें क्योंकि कहा जाता है कि “World suffers not because of the violence of the bad people but because of the silence of the good people.” लिखने-पढ़ने वालों को चाहिए कि वे विपक्षी भूमिका निभाएं, मंचीय कविता पाठ करने वालों की ज़िम्मेदारी है कि वे बिना व्यक्तिगत हितों के बारे में सोचते हुए क़लम के सिपाही होने का फ़र्ज़ अदा करें। यह मैं इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि मेरी मित्र सूची में ऐसे लोगों की बड़ी संख्या मौजूद है जो मंचीय काव्यपाठ से जुड़ी हुई है। मैंने भावनाओं के ज्वर में एक छोटा सा प्रयास किया है, आप इसे व्याकरण और बहर-मात्रा की दृष्टि से ख़ारिज कर सकते हैं, आप कीजिए लेकिन ख़ामोश मत रहिए वर्ना कल आप कायर कहलाएंगे।

ओ ‘संस्कृति’ के रक्षकों, छिपकर कहां बैठे हुए हो,
क्यों तुम्हारा रक्त ठंडा, क्यों अधर पर मौन है?

हैं कहां सब काफ़िले वे जो कि हर दिन,
‘संस्कृति’ की दे दुहाई चीख़ते हैं?
हैं कहां वे जोकि गर्वित हिंद पर हैं,
क्यों विफ़लताओं से आंखे मीचते हैं?

ओ न्याय के ध्वजवाहकों, आंखों पे पट्टी क्यों धरे हो,
क्यों नहीं कुछ देखते कि आज दोषी कौन है?

भीड़ बनकर जो बचाते ‘संस्कृति’ को,
क्यों उन्हें अस्मत ज़री दिखती नहीं?
उत्पात कर गौरव दिलाते भारती को,
‘संस्कृति’ क्या देश की बेटी नहीं?

ओ कवि, ओ लेखकों, यशगान करते हिंद का जो,
है कहां अब शौर्य सारा, क्यों क़लम पर मौन है?

मैं प्रणय के गीत गा सकता हूं लेकिन,
मुंह चुरा लूं कैसे इन हालात से?
मैं भी लिख सकता हूं मौसम की बहारें,
कैसे समझौता करूं जज़्बात से?

देश के परिवेश में नफ़रत की ज्वाला भर रहे जो,
अपने घर को आग देकर बोलो‌ बचता कौन है?

ओ ‘संस्कृति’ के रक्षकों, छिपकर कहां बैठे हुए हो,
क्यों तुम्हारा रक्त ठंडा, क्यों अधर पर मौन है?

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